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JOIN-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान-BAAS

15 March 2011

15 March 2010

प्रधान न्यायाधीश का बयान अस्वीकार्य : डॉ. मीणा



सत्यमेव जयते

भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)

भारत सरकार की विधि अधीन दिल्ली से पंजीबद्ध (संख्या : एस/25806/94) राष्ट्रीय निकाय
देश के 17 राज्यों में 4100 से अधिक आजीवन सदस्य सेवारत

राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय

7-तंवर कालोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर (राजस्थान)

प्रेस विज्ञप्ति

प्रधान न्यायाधीश का बयान अस्वीकार्य : डॉ. मीणा


27 February 2010

वर्तमान को पूर्णता से जियें

वर्तमान को पूर्णता से जियें



निराशा और नकारात्मकता दोनों ही चिन्ता, तनाव, क्लेश और बीमारियों की जननी हैं, जबकि आशा और सकारात्मकता जीवन में आनन्द, प्रगति, सुख, समृद्धि और शान्ति का द्वार खोलती हैं। जिससे जीवन जीने का असली मकसद पूरा होता है।

अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम किसका चुनाव करते हैं? निराशा का सन्नाटा या आशा की वीणा की झंकार? चुनाव हमारे अपने हाथ में है।



14 February 2010

परिवार की जान हैं आत्मीय सम्बन्ध!


डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

समस्या : मुझे यह बात अन्दर ही अन्दर घुन की तरह खाये जा रही है कि मेरे पडोसियों में से सबके पास कार है, जबकि मेरे पास आज के जमाने की अच्छी सी मोटरसाईकल भी नहीं है।

समाधान :
1- कार, फ्रिज, एसी, आदि वस्तुएँ आपको सुविधा एवं सहूलियतें तो प्रदान कर सकती हैं, लेकिन सुख नहीं।
2- सुख पाने के लिये हमें आपस में ही एक-दूसरे का पूरक बनना सीखना होगा। उसके बाद परिवार में कार हो या नहीं कोई फर्क नहीं पडेगा।
3- आपस में आत्मीयता होने पर कोई किसी से न तो झगडा करेगा और न हीं ईर्ष्या।
4- अतः जरूरत इस बात की है कि आपस में खुलकर बात करें, एक-दूसरे की भावनाओं और जरूरतों का खयाल रखें।
5- जब आपस में सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध होंगे। परमात्मा का आशीर्वाद भी आपके साथ होगा।



मित्रो, हम में से अनेक लोग छोटी-छोटी बातों को लेकर दुःखी और परेशान रहते हैं, जबकि गहराई में जाकर देखने से ज्ञात होता है कि हकीकत में जिन बातों के कारण या जिन परिस्थितियों के कारण हम दुःखी हो रहे हैं, वे सच में दुःख का कारण हैं हीं नहीं। दुःख का कारण तो उन सबके प्रति हमारा सोचने का नजरिया होता है। यदि हम खुले मन से और सकारात्मक तरीके से सोचने व समझने लगें तो हम इस प्रकार की स्थिति से बच सकते हैं।

एक दिन मेरे पास मनु शर्मा जी (बदला हुआ नाम) आये और कहने लगे सर मुझे यह बात अन्दर ही अन्दर घुन की तरह खाये जा रही है कि मेरे पडोसियों में से सबके पास कार है, जबकि मेरे पास आज के जमाने की अच्छी सी मोटरसाईकल भी नहीं है। बच्चे भी कार की जिद कर रहे हैं। इस कारण से मैं हमेशा तनाव में रहता हूँ। हमेशा सिरदर्द रहने लगा है। मैं डॉक्टर को दिखाने गया, उन्होंने बताया कि मुझे हाईपरटेंसन हो गया है। आप ही बतायें कि मैं इस समस्या से किस प्रकार से निजात पा सकता हूँ।

जब मनु शर्मा जी यह सब कह रहे तो मेरे पास जगदीश सैनी (बदला हुआ नाम) पहले से ही बैठे हुए थे। वे अपनी एक समस्या लेकर आये थे। मैंने कहा कि शर्माजी मैंने आपकी बात सुन ली, अब आपको इन सैनी जी की समस्या भी सुना देता हूँ। इन्होंने भी तुम्हारी भांति अपने मित्रों और परिचितों की देखादेख कार खरीद ली। स्वयं के पास और इनके दोनों बेटों के पास पहले से ही तीन मोटरसाईकलें भी थी। अब इनकी समस्या यह है कि इनके बेटे इस बात के लिये झगड रहे हैं कि कार पर उन दोनों का समान हक है। इसलिये वे दोनों ही कार को चलाना चाहते हैं, सैनी जी को तो वे पूछना ही नहीं चाहते कि कार पर उनका भी हक है या नहीं! जीवन भर पुराने जमाने के स्कूटर पर चलकर नौकरी करते रहने वाले सैनी जी ने सोचा कि अब पौढावस्था में कार लेना ठीक रहेगा, लेकिन सैनी जी की पत्नी सहित परिवार में ऐसा कोई भी नहीं है जो इस बात को समझना चाहता हो कि सैनी जी को भी कार चलाने का हक है, जबकि कार सैनी जी ने अपनी कमाई से खरीदी है, कार का पेट्रोल भी सैनी जी ही भरवाते हैं। इस कारण से सैनी जी तनावग्रस्त हो गये हैं और सोचते हैं कि वे कार को बेच डालें! यह बताकर मैंने पूछा कि शर्मा जी आपके कितने बेटे हैं?

शर्मा जी बोले साहब मेरे तो तीन-तीन बेटे हैं और एक बेटी भी है जो तीनों बेटों से जबर है। मुझे तो लगता है कि यदि मैं कार ले आया तो मेरी बेटी कार को किसी को चलाने ही नहीं देगी। पहले से ही बात-बात पर कहती रहती है, मैं तो कुछ समय बाद ये घर छोड देने वाली हूँ। अतः जब तक इस घर में हूँ हर चीज पर मेरा हक सबसे अधिक है। मनु शर्मा जी आगे बोले लगता है कि मैं आपके पास सही समय पर आया हँू। जगदीश सैनी जी की बात सुनकर लगता है कि मैं एक बडी मुसीबत से बच गया हूँ। सर आपने मेरी समस्या का समाधान कर दिया, इसके लिये मैं आपका हमेशा-हमेशा आभारी हूँ। धन्यवाद सर धन्यवाद!

जब आपस में सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध होंगे। परमात्मा का आशीर्वाद भी आपके साथ होगा।
मैं यह बताना चाहता हूँ, कि मैंने तो मनु शर्माजी की समस्या का कोई उपचार या समाधान नहीं किया, बस शर्माजी को मेरे साथ बातचीत करके इस बात का अहसास हो गया कि कार लाकर वह अपने आस पास के लोगों से बराबरी तो कर लेंगे, लेकिन अपने घर की शान्ति भंग होने का खतरा भी उन्हें नजर आने लग गया और वर्तमान में उनका जो तनाव था, उससे बडा तनाव उन्हें कार लाने में नजर आने लगा। अतः उनकी समस्या हल हो गयी। जगदीश सैनीजी की समस्या का क्या हुआ? इस बारे में फिर कभी चर्चा करेंगे। फिलहाल हमें इस बात को भी समझना होगा कि यदि हालात जगदीश सैनी और मनु शर्मा जैसे हों तो या इस प्रकार के हालात उत्पन्न होने की सम्भावना हो तो क्या कार नहीं खरीदी जानी चाहिये? नहीं मेरा ऐसा मानना नहीं हैं। न हीं मैंने मनु शर्मा को ऐसी सलाह दी है। उसने जगदीश सैनी की बात सुनकर स्वयं ही कार नहीं खरीदने का निर्णय लिया है।
परिवार की पहली जरूरत है आत्मीयता।

मैं तो यह कहना चाहता हूँ कि हम सभी जानते हैं कि हर काम को करने से पूर्व हर व्यक्ति को थोडी तैयारी करनी होती है। परन्तु दुःख का विषय है कि हम में से बहुत कम लोग हैं जो अपने परिवार को बनाने अर्थात्‌ आत्मीय सम्बन्धों की बुनियाद रखने के लिये किसी प्रकार की तैयारी किये बिना ही अपने परिवार को परिवार मानते रहते हैं। जबकि परिवार की पहली जरूरत है आत्मीयता।
सुख पाने के लिये हमें आपस में ही
एक-दूसरे का पूरक बनना सीखना होगा।

अतः सभी मित्रों से मेरा साफ शब्दों में कहना है कि कार, फ्रिज, एसी, आदि वस्तुएँ आपको सुविधा एवं सहूलियतें तो प्रदान कर सकती हैं, लेकिन सुख नहीं। सुख पाने के लिये हमें आपस में ही एक-दूसरे का पूरक बनना सीखना होगा। उसके बाद परिवार में कार हो या नहीं कोई फर्क नहीं पडेगा। आपस में आत्मीयता होने पर कोई किसी से न तो झगडा करेगा और न हीं ईर्ष्या। अतः जरूरत इस बात की है कि आपस में खुलकर बात करें, एक-दूसरे की भावनाओं और जरूरतों का खयाल रखें। जब आपस में सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध होंगे। परमात्मा का आशीर्वाद भी आपके साथ होगा। इसके बाद कुछ भी शेष नहीं रहता है। शुभकामनाओं सहित!
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-लेखक होम्योपैथ चिकित्सक, मानव व्यवहारशास्त्री, दाम्पत्य विवादों के सलाहकार, विविध विषयों के लेखक, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, लोगों से काम लेने की कला, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं 1994 से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। जिसमें 10 फरवरी, 2010 तक, 4070 रजिस्टर्ड आजीवन कार्यकर्ता देश के 17 राज्यों में सेवारत हैं। फोन नं. 0141-2222225 (सायं 7 से 8 बजे)

13 February 2010

बोलोगे नहीं तो कोई सुनेगा कैसे?



"बोलोगे नहीं तो कोई सुनेगा कैसे?"

हम सभी जानते हैं कि "हमारे साथ होने वाले अन्याय का बडा कारण है, हमारी चुप रहने की आदत।"

इसलिए दोस्तों शिक्षा से भी ज्यादा जरूरी है-"अपनी बात को बोलना आना। बोलने की हिम्मत होना।"

मैंने अपने जीवन में अनुभव किया है कि-

"जो लोग अपने दिल की बात बोल नहीं सकते हैं, उन्हें अनेक प्रकार के तनाव और अनेक तरह की शारीरिक बीमारियों की पीडाओं को झेलते रहना पडता है।"

संसार में हजारों लोगों ने पीड़ित और भयभीत लोगों को अपनी सही बात, सही तरीके से बोलना सिखाने के लिए अनेक उल्लेखनीय कार्य किये हैं, लेकिन हम देख रहे हैं कि साधारण लोगों में अन्दर तक इतना अधिक भय व्याप्त है, जिसके चलते उनकी हिम्मत जवाब दे चुकी है। ऐसे भयभीत लोगों को भयमुक्त करने हेतु, किसी भी सरकार द्वारा, देश के किसी भी स्कूल में शिक्षा नहीं दी जाती है। इसके साथ-साथ आम लोगों के प्रति सरकार, प्रशासन और पुलिस की ओर से भी नकारात्मक, असंवेदनशील और उदासीन रवैया अपनाया जाना और भी घातक है।

इस प्रकार के हालतों से जूझ रहे लोगों को अपनी बात बोलने के लिए एक मंच की जरूरक अनुभव की गयी|

अत: हमने में शहीद-ए-आजम और सर्व कालिक भारत रत्न भगत सिंह की जयंती के दिन 27 सितम्बर, 1993 को "भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान" नामक संगठन कि स्थापना की, जिसका संक्षिप्त नाम BAAS है। इसका भारत सरकार की विधि अधीन 06 अप्रैल, 1994 को सम्पूर्ण भारत में कार्य करने के लिए पंजीकरण करवाया गया।

वर्ष 2005 तक हम बिना किसी स्थायी व्यवस्था के काम करते रहे। लोगों को वार्षिक सदस्य बनाते रहते थे, जिसमें हर साल बहुत सा समय सदस्यों के नवीनीकरण में ही बर्बाद हो जाता था। लेकिन इस दौरान हमने बहुत कुछ सीखा, अनुभव किया और अन्ततः कुछ कानूनी औपचारिकताएँ पूरी करने के बाद 21 नवम्बर, 2005 से इस संस्थान में हमने इच्छुक एवं योग्य लोगों को आजीवन प्राथमिक सदस्यता देना शुरू कर दिया। अब कोई भी 18 वर्ष कि आयु पूर्ण कर चुका स्वच्छ छवि का शिक्षित, स्वावलंबी और आत्मनिर्भर व्यक्ति इस संस्थान की सदस्यता हेतु आवेदन कर सकता है।

संस्थान के विकास एवं विस्तार में अनेक सक्रिय साथियों का अच्छा सहयोग रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप आजीवन सदस्यों कि संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है| खुशी की बात है कि लोगों में बास की सदस्यता ग्रहण करने के बाद लगातार आत्मविश्वास बढ रहा है।

सदस्यों एवं आम लोगों को सभाओं, बैठकों, प्रशिक्षणों, व्यक्तिगत चर्चाओं, समाचार-पत्रों आदि के माध्यम से जागरूक किया जा रहा है, जिसमें मेरे अपने "मानव व्यहार" से सम्बन्धित ज्ञान और अनुभव का सदस्यों को लाभ एवं मार्गदर्शन मिल रहा है।

इस सबके परिणामस्वरूप आम लोगों ने मेरी बात सुनी और यह कारवां चल निकला है।

इस संगठन को हमने एक एक जनांदोलन के रूप में चलाने का निर्णय लिया है। इसलिये मैंने अपने साथियों का आह्वावान करने के लिए कुछ पंक्तियों का चयन किया है या ये कहना अधिक ठीक होगा कि अनुभव के साथ-साथ अपने आप इनका चयन होता गया।जैसे-

"हमारा मकसद साफ! सभी के साथ इंसाफ !!''

मैंने ये कहकर लोंगों को अपने साथ बुलाया-

"एक साथ आना शुरुआत है,
एक साथ रहना प्रगति है और
एक साथ काम करना सफलता है।''

इन शब्दों ने जादू का सा काम किया और लोग हमारे साथ चल दिए।
दिन-प्रतिदिन यह कारवां बढता ही चला जा रहा है।

मैंने मेरे हजारों साथियों से आगे कहा कि -

"शोषण की चक्की में पिसते वही, जिनकी आवाज में ताकत नहीं।''

देखते ही देखते लोगों का लगातार जुड़ना जारी रहा|

अब मुझे अंत में केवल सूत्र वाक्य-

"बोलोगे नहीं तो कोई सुनेगा कैसे?''
को ही याद दिलाना पडता है और कारवां चलता रहता है। चलता जा रहा है।

अब मैं देश के हर उस व्यक्ति का आह्वान करता हूँ-

-जिनमें अपनी खुद्दारी को जिंदा रखने की चाहत है!

-जो साल के तीन सौ पैंसठ दिनों में से कम से कम बारह दिन इस संस्थान के लिए निकाल सकें!

-जो अपनी मेहनत से कामये गए सौ रुपये में से कम से कम दस पैसे इस संस्थान के संचालन हेतु अनुदान कर सकें!

-जो कम से कम 7 लोगों को इस संस्थान में सदस्य के रूप जुडवा सकें! और

-जरूरत के वक्त इस जनान्दोलन का हिस्सा बन कर संघर्ष करने को तैयार रहें।

आपका साथी

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
फोन : 0141-2222225 (समय : सायं : 7 से 8 बजे तक)
Mob : 098285-02666

20 November 2009

गुलामी का प्रतीक धारा 151 आज भी लागू!

यह एक ऐसा मनमाना प्रावधान है, जिसके तहत अपराध हुआ नहीं और पुलिस कहती है कि उसे लग गया कि अपराध किया जा सकता था। इस प्रावधान के चलते कभी भी, किसी को भी गिरफ्तार करके हवालात में बन्द कर देना पुलिस के बायें हाथ का खेल है। गहराई में जाकर देखा जाये तो यह कानून अंग्रेजों द्वारा उनके विरुद्ध आवाज उठाने वाले भारतीयों को कुचलने के लिये बनाया गया था, लेकिन दण्ड प्रक्रिया संहिता में इसे आज भी स्थान दिया गया है। जो पुलिस के लिये आजाद देश के नागरिकों के उत्पीडन करने का कानूनी हथियार सिद्ध हो रहा है। इस प्रकार की अंग्रेजों द्वारा बनायी गयी, अनेक धाराएँ आज भी भारतीय कानूनों में चल रही है। सरकार को चाहिये कि इनको तत्काल दण्ड प्रक्रिया संहिता से निकाला जावे।
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आजादी से पूर्व भारत में अंग्रेजों का राज्य था और कानून के नाम पर अंग्रेजों ने हम पर अनेक ऐसी व्यवस्थाएँ जबरन थोपी, जिनका न्याय से दूर का भी वास्ता नहीं था। जबकि कानून कैसा हो इस बारे में विश्व के सभी विधिवेत्ताओं का मानना है कि कानून एक निष्पक्ष व्यक्ति की आत्मा की आवाज होना चाहिये।


न्यायशास्त्र में यह भी कहा गया है कि कानून नागरिकों के लिये होते हैं, न कि नागरिक कानूनों के लिये। यदि कोई कानून नागरिकों के सम्मान एवं जीवन में गैर-जरूरी हस्तक्षेप करता है तो ऐसा कोई भी कानून विधि-सम्मत नहीं माना गया है। इस विचार की पुष्टि भारतीय संविधान के भाग 3, अनुच्छेद 13 के उप अनुच्छेद (1) एवं (2) को पढने से भी होती है। जिनमें साफ शब्दों में कहा गया है कि संविधान के भाग तीन में प्रदान किये मूल अधिकारों का हनन करने वाले या मूल अधिकारों को कम करने वाले, आजादी से पूर्व में बने सभी कानून संविधान लागू होते ही स्वतः समाप्त (शून्य) हो जायेंगे और संविधान लागू होने के बाद भी मूल अधिकारों के विपरीत सरकार, संसद, या विधान मण्डलों द्वारा कानून नहीं बनाये जा सकेंगे। इसके बावजूद भी यदि ऐसे कानून बनाये जाते हैं तो वे कानून उस सीमा तक शून्य होंगे, जिस सीमा तक वे मूल अधिकारों का हनन करते हैं या मूल अधिकारों को कम करते हैं।


पाठकों की जानकारी के लिये संविधान के उक्त प्रावधान का उपबन्ध करने वाले अनुच्छेद 12 का मूल पाठ यहाँ प्रस्तुत हैः-

"13. मूल अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाली विधियाँ-

(1) इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले भारत के राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त सभी विधियाँ उस मात्रा तक शून्य होंगी जिस तक वे इस भाग (भाग-॥।, जिसका शीर्षक है-मूल अधिकार) के उपबंधों से असंगत हैं।

(2) राज्य (भाग-3, के अनुच्छेद 12 में राज्य की परिभाषा दी गयी है, जो इस प्रकार है-अनुच्छेद : 12. परिभाषा-इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, राज्य के अंतर्गत भारत की सरकार और संसद तथा राज्यों में से प्रत्येक राज्य की सरकार और विधान-मंडल तथा भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन सभी स्थानीय और अन्य प्राधिकारी हैं।) ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो इस भाग (भाग-3, जिसका शीर्षक है-मूल अधिकार) द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनती है या न्यून (कम) करती है और इस खंड (अनुच्छेद 13 के खण्ड 2) के उल्लंघन में बनाई गई प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक शून्य होगी।"


इतना ही नहीं, बल्कि उक्त प्रावधान के होते हुए भी यदि सरकार द्वारा कोई ऐसा कानून बना दिया जाता है, जो संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों का हनन करता है या उन्हें कम करता है तो, ऐसे किसी भी कानून को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सीधे अपने राज्य के हाई कोर्ट में या अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर, उसे असंवैधानिक भी घोषित करवाने का भी मूल अधिकार है। उक्त विवेचन में संविधान के तहत प्रदान किये गये मूल अधिकारों की महत्ता स्वतः ही प्रमाणित हो जाती है। लेकिन जैसा कि प्रारम्भ में ही लिखा गया है कि कानून के नाम अंग्रेजो द्वारा हम पर अनेक ऐसी व्यवस्थाएँ जबरन थोपी गयी थी। जिनका न्याय से दूर का भी वास्ता नहीं था। उन सभी व्यवस्थाओं को उक्त अनुच्छेद 13 (1) के तहत समाप्त कर दिया गया है, लेकिन इसके बावजूद भी अनेक असंवैधानिक कानूनी प्रावधान आज भी नागरिकों के मूल अधिकारों का हनन कर रहे हैं। उदाहरण के लिये अनुच्छेद 22 (1) में साफ शब्दों में कहा गया है कि-
"22. (1) किसी व्यक्ति को जो गिरफ्तार किया गया है, ऐसी गिरफ्तारी के कारणों से यथाशीघ्र अवगत कराए बिना अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं रखा जाएगा या (उसे) अपनी रुचि के विधि व्यवसायी (एडवोकट) से परामर्श करने और प्रतिरक्षा (बचाव) कराने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जाएगा।" संविधान में उक्त मूल अधिकार केवल भारत के नागरिकों को ही नहीं, बल्कि भारत में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को दिया गया है। जिसके अनुसार बिना कारण बताये किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करना असंवैधानिक है।"
इसके बावजूद भी भारत में अंग्रेजों के जमाने में लागू की गयी और उसे कुछेक बदलावों के बाद स्वीकार की गयी दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 151 में प्रावधान किया गया है कि कोई पुलिस अधिकारी, बिना वारण्ट और बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के किसी भी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करके बन्द कर सकता है, जिसके बारे में पुलिस अधिकारी को जानकारी हो कि वह व्यक्ति कोई संज्ञेय अपराध करने की कल्पना कर रहा है और उसे रोक पाना सम्भव नहीं है। इस प्रकार के कानून अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को उत्पीडित करने के लिये बनाये गये थे। इस कानून में आश्चर्यजनक तथ्य है कि जो अपराध अभी किया नहीं गया है, केवल उस अपराध को करने की, एक व्यक्ति कथित रूप से कल्पना मात्र कर रहा है, उसकी भी जानकारी पुलिस अधिकारी को मिल जाती है। फिर भी वह उस अपराधी को ऐसा अपराध करने से रोकने में अक्षम है। इसलिये उसे गिरफ्तार करके बन्द कर देता। इस सम्बन्ध में सबसे पहली बात तो यह है कि दण्ड प्रक्रिया संहित की धारा 151 का उक्त प्रावधान संविधान के उक्त अनुच्छेद 22 (1) के में प्रदान किये गये मूल अधिकार को कम करने वाला होने के कारण और संविधान के अनुच्छेद 13 (2) के भी विपरीत होने के कारण विधि-सम्मत नहीं होकर शून्य है। द्वितीय यहाँ यह भी विचारणीय है कि एक ओर तो धारा 151 में पुलिस को इतनी सक्षम माना गया है कि किसी व्यक्ति द्वारा अपराध किये जाने की कल्पना करते ही, पुलिस उस कल्पना करने वाले का पता लगा लेती है, लेकिन इसके ठीक विपरीत इसी धारा में पुलिस इतनी कमजोर भी मानी गयी है कि जिस व्यक्ति के बारे में पुलिस को पता चल चुका है कि वह कथित रूप से अपराध करने की कल्पना कर रहा है, उसे बिना गिरफ्तार किये सम्भावित अपराध करने से रोकने में अक्षम है। इसलिये इस धारा की आड में इस देश की पुलिस अपराध किये जाने की कल्पना मात्र को आधार बनाकर किसी भी निर्दोष व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है।


यह एक ऐसा मनमाना प्रावधान है, जिसके तहत अपराध हुआ नहीं और पुलिस कहती है कि उसे लग गया कि अपराध किया जा सकता था। इस प्रावधान के चलते कभी भी, किसी को भी गिरफ्तार करके हवालात में बन्द कर देना पुलिस के बायें हाथ का खेल है। गहराई में जाकर देखा जाये तो यह कानून अंग्रेजों द्वारा उनके विरुद्ध आवाज उठाने वाले भारतीयों को कुचलने के लिये बनाया गया था, लेकिन दण्ड प्रक्रिया संहिता में इसे आज भी स्थान दिया गया है। जो पुलिस के लिये आजाद देश के नागरिकों के उत्पीडन करने का कानूनी हथियार सिद्ध हो रहा है। इस प्रकार की अंग्रेजों द्वारा बनायी गयी, अनेक धाराएँ आज भी भारतीय कानूनों में चल रही है। सरकार को चाहिये कि इनको तत्काल दण्ड प्रक्रिया संहिता से निकाला जावे।

-लेखक होम्योपैथ चिकित्सक, मानव व्यवहारशास्त्री, दाम्पत्य विवादों के सलाहकार, विविध विषयों के लेखक, कवि, शायर, चिन्तक, शौधार्थी, तनाव मुक्त जीवन विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं 1994 में राष्ट्रीय स्तर पर पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। दिनांक : 18.11.2009 तक, बास के 3884 रजिस्टर्ड आजीवन कार्यकर्ता देश के 17 राज्यों में सेवारत हैं।

11 November 2009

मेरी जुंबां-मेरी शायरी

जिन्हें देखे बिना ही लगता है,
हमें देखे जैसा।
जियेंगे कैसे हम,
गर नहीं मिला, कोई उन जैसा॥


(प्रेसपालिका-01-15 दिसम्बर, 2008 में प्रकाशित)
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कब्र तक पहुंचाने वाले अदा करते हैं शुक्रिया हम।
इस मंजिल से आगे, अकेले ही चले जायेंगे हम॥


कहते थे लोग इश्क का रोग
जिसे शायद यही है वो।
न जाने किधर से मेरे दिल में,
समाया जाता है वो॥


मिलने का करके वायदा
और भी मुश्किल में डाला आपने।
मुश्किल थी जिन्दगी मेरी,
अब मरना भी मुश्किल हो गया॥


दिल तो कहता है कि
 मर जाऊं तेरी याद लिये।
होश कहता है कि
उनसे भी तो मिलते जाओ॥

मैंने सिर्फ और सिर्फ आवाज सुनी है, उसकी।
लगता है, मूरत दिल में बस गयी है, उसकी॥ 




(प्रेसपालिका-16-31 दिसम्बर, 2008 में प्रकाशित)
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करूं न क्यों शिकवा तुझसे,
मेरी तकदीर को लिखने वाले।
रो पडे तू भी, अगर तू मेरा मुकद्दर,
मेरे ये हालात देख ले॥



ऐसा न हो कि मेरे दिल का ये दर्द, बन जाये नासूर।
कहीं ऐसा न हो कि तुम प्रायश्चित्‌ भी न कर सको॥



मैंने भी तुझको न समझा,
तूने भी की अनगिनत खताएँ।
आ गया वक्त मरने का,
अब तू किसलिये मुझे सताए॥


वादा न ले, वादा तो वादा है,
ये न याद रहेगा मुझको।
कर तू सिर्फ इतना,
अपनी बांहों में सम्भाल ले मुझको॥


इन स्याह रातों में,
अब यादों का सहारा भी नहीं मुझको।
वर्षों सम्भाला तुमने जिसको,
क्यों छोड चले तन्हा उसको?

कैसा ये शिकवा कि मैं तुमसे बेखबर हूँ।
मैं तो खुद अपने ही हाल से बेखबर हूँ॥


रूठ के चल तो दिये हो बेरहम
तुम, आँख चुराके मुझसे।
बसता हूँ मैं तो दिल में,
धडकोगे तुम मुझ बिन किससे?

तू जो एक बोतल शराब हो जाये।
जिन्दगी मेरी कामयाब हो जाये॥


जब जाना मेरा दर्दोगम होश उन्होंने खो दिये।
आये थे समझाने और सुनके मेरी खुद रो दिये॥




किस उम्मीद से हम किसी को देखें?
क्या कोई मेरे महबूब से भी हंसी होगा?


कांटों से बचके लोग, फूलों को गले लगाते हैं?
एक हम हैं कि जिसने फूलों से जख्म खाये हैं?

तू ही बता ए दोस्त, दूँ क्या जवाब उनको?
पूछते हैं वो मुझसे, तूने क्यों चाहा मुझको?

पूछती हैं वो हमसे हर कदम, क्यों इत-उत देखते हो मेरे बलम?
करे क्या कोई, देखकर हूरों को पड जाये जो ईंमां में खलल?

डर से मौत के, बे-वजह परेशान हैं आप।
आप जिन्दा ही कहाँ हैं, जो मारे जायेंगे?

(प्रेसपालिका-16-31 दिसम्बर, 2008 में प्रकाशित)
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आप क्यूं परेशान हैं, हमको आजमाने में।
मिला है दर्द हमको, वफा निभाने में॥


(प्रेसपालिका-01-15 मार्च, 2009 में प्रकाशित)
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जिन्हें देखा नहीं कभी, वो अक्सर याद आते हैं।
देखता हूँ जिन्हें रोज, भुलाने को जी चाहता है॥

नहीं देखा फिर भी किस तरह भुलाँऊं उनको मैं।
कैसे बताऊं, किस बात पर याद नहीं आते हैं॥

(प्रेसपालिका-16-31 मार्च, 2009 में प्रकाशित)
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जी रहे थे हम, जिन दिली तमन्नाओं और ख्वाबों के भरोसे-
मसला, कुचला और बर्बाद किया है, दिल में बसने वालों ने।

किनसे लें बदला, किनसे करें, किसकी शिकायत?
जब मेरे हत्यारों को, पनाह दी मेरे ही माँ-बाप ने॥

जिन घरों की दीवारें, मेरे खून-पसीने से महकी हैं।
अब वो ही दरो-दीवार, मेरे अरमानों के कत्लगाह हैं॥

होकर कैद से आजाद, न कर तू आजादी का इजहार।
तेरी तमन्ना-ए-आजादी, अपनों के अहसानों तले कैद हैं॥

मुखालफत की हो, जिसने अपनों के जुल्मों की।
सहनी ही होगी उसे, सजा अपने इन कुकर्मों की॥

सारी तमन्नाओं को मार कर, वो जिन्दा लाश बन गया।
करता भी क्या, जब कुनबा ही उसका हत्यारा बन गया॥

जिनकी खुशियों की खातिर, मैंने अपनी खुद्दारी तब बेच दी।
मेरे अरमानों की हत्या कर, सबने नफरत की कीलें ठोंक दी॥

बडी खुशनुमा और हसीन हो सकती थी, ये जिन्दगी।
मेरे अपनों ने ही जिसे, सजा-ए-उम्र-कैद बना दिया॥

जिन्हें शान-ओ-शराब में ही जिन्दगी नजर आती है।
मेरी लाचार नजरें भी उन्हें, अपराधी नजर आती है॥

जरूरत है जिस-जिस चीज की, वो तुम कुछ भी मत छोडो।
कुछ मत भी छोडो, पर सांस लेने का कोई तो बहाना छोडो॥

मर तो जाता, मगर नजरों में एक चेहरे का ख्वाब बाकी है।
क्या करूं, उस चेहरे के दीदार का अरमान अभी बाकी है॥

दर्द-ओ-गम और जिल्लत की मुखालफत ही मेरा अपराध है।
मौत से बदतर हालातों में भी जिन्दा हूँ, यही मेरा अपराध है॥

जुल्मों की जंजीरों में जो बन्दा, हर तरह लाचार और हताश है।
आश्चर्य है, हैवानों को, इस जिन्दा लाश से किसकी आस है?

दुआओं का सागर था जो दिल, दर्दे गम का समन्दर हो गया।
जिन्हें सींचा था मैंने प्यार से, मैं उनकी नफरतों में खो गया॥

इस बियावान इंसानों के शहरी जंगल में, मैं अकेला रह गया।
कैसे किसको पुकारूं अब, मेरा ये भी गया, मेरा वो भी गया?

कदम चूमती हैं मंजिलें, चलकर उन राहगीरों के।
कूबत हो जिनमें, चुनकर राह अकेले चलने की॥

जिन्हें देखा नहीं कभी, वो अक्सर याद आते हैं।
देखा मैंने है जिन्हें, रोज भूल जाने को जी चाहता है॥

क्यों उठाते हो कसम, क्यों करते हो वायदा तुम?
याद आते ही हमारी, रोज नीयत खराब होती है॥

नहीं देखा फिर भी, किस तरह भुलाँऊं उनको मैं।
कैसे बताऊं, वो किस बात पर याद नहीं आते हैं॥

दिल और दिमाग की रस्साकशी, ये कैसी मुसीबत है।
दिमाग तो चालाक है, दिल की सुनी तो बात बनी है॥

चाहतें-इश्क तक, न हो सकी मेरी मोहब्बत बयां।
चलते-चलते अब तो, मैं जीवन से ही हार गया॥

समझ बैठे थे, जिसे हम अपनी ख्वाब-ए-मंजिल।
वो तो खुद ही, अपनी मंजिल की तलाश में था॥

मैं कोई पुराना शराबी नहीं, जो पीके भी नशा न हो।
सिर्फ एक प्याला, अपनी आँखों से पिलाके तो देख॥

मुझे पानी समझने वाले, पुरानी शराब हूँ मैं।
अपने होठों से तो लगा, अंगूरी शराब हूँ मैं॥

माना कि खाली है पैमाना, मगर गुरेज नहीं।
होता है नशा मुझे, जब आती है याद तेरी॥

दिल में न उतर सकी, कोई भी तीरे नजर।
सो जी रहा हूँ, मैं किसी के इन्तजार में॥

(प्रेसपालिका-16-30 अप्रेल, 2009 में प्रकाशित)
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बैठना पास उस गैर के, क्या बहुत जरूरी था।
लिहाज तुमने जरा भी हमारा नहीं किया था॥


(प्रेसपालिका-01-15 मई, 2009 में प्रकाशित)
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-डॉ। पुरुषोत्तम मीणा "निरंकुश"
लेखक, कवि, शायर, चिन्तक एवं सामाजिक कार्यकर्ता